किसानों से भूमि छिनेगी नयी सरकारी भूमि सुधार नीति, भाकिसं का विरोध

undefinedनागपुर, सितम्बर 4 : भारत सरकार की प्रस्तावित भूमि सुधार नीति देश के किसानों को खेती के लिये प्रेरित करने में नाकाम तो रहेगी बल्की उसके कुछ नियम किसानों से उनकी भूमि छिनने को बल प्रदान करेगी| लगता है कि कृषि तथा कृषक के प्रति सदा ही असंवेदनशील और अनिच्छुक रही भारत सरकार का नया प्रस्तावित भूमि सुधार प्रारूप भारत के किसानों में असंतोष का भाव जागृत करने काम करेगा|

भारत में 1950 और 1960 के दशक में भूमि सुधार के कार्यक्रम को व्यापक रूप से लागू किया गया| इस संदर्भ में कानून बनाकर इसे कार्यक्रम को संवैधानिक शक्ति भी प्रदान की गई| इस कार्यक्रम पर समाजवाद का प्रभाव स्पष्टरूप से दिखता है| भूमि सुधार कार्यक्रम से ग्रामीण अंचल में व्याप्त गरीबी व असंतोष समाप्त होगी और विकास की प्रक्रिया गतिमान होगी ऐसा कहा गया था| इस कार्यक्रम को लागू करने में आज 50-60 साल हो गए| इसकी समीक्षा के लिए इतना कार्यकाल पर्याप्त है| भारत सरकार ने भी इसकी समीक्षा कर नए भूमि सुधार कानून की तैयारी की है| सरकार ने राष्ट्रीय भूमि सुधार कानून के लिए एक प्रारूप तैयार किया है और इस सन्दर्भ में संबंधित व्यक्तियों तथा संगठनों से सुझाव मांगे हैं|

भारतीय किसान संघ (भाकिसं), जो देश में किसानों का सबसे बड़ा गैर सरकारी संगठन है, ने भी इस पर कुछ आपत्ति जताई है, साथ ही कुछ सुझाव भी सरकार को दिए हैं| ये सुझाव और आक्षेप अत्यंत गंभीर हैं और सरकार द्वारा मान्य संकल्पनाओं का खोखलापन साबित करनेवाले हैं| इन सुझावों और आक्षेपों पर सरकार द्वारा गंभीरता और सकारात्मक ढंग से संज्ञान लेने की आवश्यकता है|

भूमि सुधार को चुनौती

भारतीय किसान संघ ने सरकार के ‘भूमि सुधार’ की संकल्पना को ही चुनौती दी है| प्रारूप में जो भूमि सुधार का अर्थ कहा गया है वह विशुद्ध रूप से एक किसान से उसकी जमीन छीनकर अन्य भूमिहीनों को बांटना है। इसके पूर्व देश में लागू किए गए भूमि के अधिकतम सीमा कानून भी इसी उद्देश्य से लाए गए थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद गरीबी हटाने हेतु यह सम्पत्ति (कृषि भूमि) छीनने का विचार केवल किसानों तक सीमित रखा गया। इसमें शहरी आबादी पर एवं औद्योगिक आबादी पर गरीबी हटाने हेतु सम्पत्ति बांटने का कोई भी भार नहीं रखा गया। ‘‘औद्योगिक सुधार’’ का अर्थ वह नहीं निकाला गया जो ‘‘भूमि सुधार’’ शब्द का निकाला गया है। इस अर्थ से तो सभी उद्योगपतियों से उनके उद्योगों को एक सीमा तक रखकर, अन्य सम्पत्ति को छीनकर उसे भूमिहीनों या बेरोजगारों को बांट देना था, जबकि ऐसा नहीं किया गया। बल्कि उद्योगों को अधिकतम सुविधायें व अनुदान देकर उसे और अधिक विकसित किया गया। इस तरह देश का औद्योगिक ढांचा खड़ा किया गया।

वास्तव में ‘‘भूमि सुधार’’ शब्द का अर्थ औद्योगिक सुधार की तरह होना था। अर्थात, औद्योगिक सुधार की तरह ही कृषि क्षेत्र में भरपूर निवेश कर इसके मूलभूत ढांचे को और भी मजबूत करना चाहिए, जिसमें सड़क, रेल, अस्पताल, ग्राम विकास की योजना, बाजार सुविधा, आधुनिकतम विपणन व्यवस्था, प्रयोग शालाएं, नए बीज उत्पादन, गौ-विकास, देशी खाद का विकास, शिक्षा, कृषि उत्पाद को अधिक लाभकारी बनाना आदि शामिल हो। कृषि उत्पाद का खाद्य प्रसंस्करण Food Processing एवं विपणन हेतु बड़ी मात्रा में शोध कार्य होता, तो ग्रामीण आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा उच्च शिक्षा की ओर आकर्षित होता। ग्रामीण आबादी के साथ-साथ देश की आर्थिक स्थिति में न केवल सुधार होता बल्कि इसे स्थायित्व भी प्राप्त होता। जिससे औद्योगिक विकास की गति भी बढ़ती।

भूमिहीन गरीबों को भूमि का आबंटन :

यदि भूमिहीन गरीबों को पर्याप्त रोजगार उपलब्ध कराया जाए तो इसकी कोई आवश्यकता नहीं है, ऐसा भारतीय किसान संघ का मानना है, क्योंकि आज पर्याप्त भूमि स्वामी किसान भी संतुष्ट नहीं है| किसानों की आत्महत्याएं दिनोदिन बढ़ रही है| ऐसे में भूमिहीनों को किसानों की भूमि छिनकर देने से दोनों का कुछ भी लाभ नहीं होगा|

भारतीय किसान संघ मानता है कि मौजूदा कृषि हदबंदी सीमा कानूनो को पूर्ण रूप से समाप्त कर देना चाहिए, जैसे अर्बन लैन्ड सीलींग को समाप्त किया गया। क्योंकि आज परिवारों में कृषि भूमि के बंटते-बंटते नाम मात्र की भूमि ही बची है। वैसे भी देश में सम्पत्ति एवं धन के ‘धारण’ की कोई अधिकतम सीमा नहीं है, तब केवल कृषि क्षेत्र में सम्पत्ति की अधिकतम सीमा लागू करना न्यायोचित नहीं है। यदि कोई अधिकतम सीमा लागू करना ही आवश्यक हो तो सम्पूर्ण देश में निष्पक्ष रूप से सम्पत्ति धारण करने की अधिकतम सीमा सुनिश्‍चित करनी होगी।

विवादित भूमि अधिग्रहण

यह अत्यंत विवादित संकल्पना है| भारतीय किसान संघ इसकी मूलभूत भूमिका पर ही प्रश्नचिह्न लगाता है| भूमि अधिग्रहण के पक्षधर इसकी वकालत करते हुए कहते हैं कि औद्योगिक विकास के लिए भूमि अधिग्रहण आवश्यक है| भारतीय किसान संघ ने इसकी आवश्यकता को मान्य करते हुए कुछ सार्थक सुझाव दिए हैं|

किसान की कृषि भूमि का अधिग्रहण नहीं किया जाए। विकास के लिए सरकारी बंजर भूमि या अन्य भूमि का ही अधिग्रहण हो। अतिआवश्यक तथा अन्य विकल्प न होने की स्थिति में तथा आखिरी उपाय के रूप में ही कृषिभूमि अधिग्रहित हो। किंतु इसके बदले, पुर्नस्थापना व्यय दिया जाए। जो 3 किश्तों में देय होगा प्रथम किस्त उक्त भूमि के बाजार मूल्य के दोगुनी होगी। दूसरी किस्त 5 वर्षों बाद उक्त भूमि के मूल्य में बढ़ोत्तरी का अंतर, तथा अंतिम किस्त 10 वर्षों बाद उक्त भूमि के मूल्य का अंतर देय होगा। इसके अलावा यह भूमि लीज या पट्टे पर ली गई मानी जाएगी, जिसका प्रतिवर्ष लीज मूल्य (वार्षिक पट्टा मूल्य) देय होगा। जो प्रतिवर्ष ‘मूल्य इण्डेक्स’ के अनुपात में बढ़ेगा। पट्टे का वार्षिक किराया तथा पुर्नस्थापना मूल्य की प्रथम किस्त मिलने पर ही कैंजा कब्ज़ा प्राप्त होगा। भूमि का उपयोग बंद होने पर या निश्‍चित अवधि में उपयोग शुरू न होने पर, बगैर किसी राशि के वापिस किए, भूमि उसी किसान की मानी जाएगी। भूमि की उपजाऊ क्षमता कम या नष्ट होने की स्थिति में हर्जाना देय होगा।

हमें यदि सही मायनों में कृषि सुधार करके भारत के ग्रामीण अंचल की स्थिति सुधार कर कृषि का राष्ट्रीय उत्पादन में हिस्सा बढ़े, ऐसी इच्छा  है तो कृषि को भी औद्योगिक क्षेत्र के समान ही सुविधाएं और कैपिटल निवेश मिलाना चाहिए| कृषि क्षेत्र को जड़ से मजबूती प्रदान करनी चाहिए| इस दृष्टि से भारतीय किसान संघ ने जो सुझाव दिए हैं और आपत्ति जताई है, उनपर सरकार और सम्बंधित नीति निर्धारकों ने गंभीरता से विचार करना आवश्यक है|

 (भाकिसं ने जो सुझाव दिए है, उनका विस्तृत विवरण साथ में दिया है|)

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